Hindi Poems

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

By Kusum Vir 

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​​​रो​शन करो तुम इस जग को इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए 
दीपों कि माला सजे द्वार सबके 
कोई घर तिमिर से ढका रह न पाए नेहों से पूरित हो दीपों कि बाती 
नफ़रत की  आँधी बुझाने न पाए 
सुरीली हो  सरगम सुप्रीत इतनी 
वितृष्णा के स्वर इसमें मिलने न पांएँ 
न वैरों कि बस्ती हो आपस के झगड़े 
दीवारें मज़हब की खड़ी हो न पाएँ 
उड़ेलें सुधारस इतना ज़मीं परप्यासा कोई फ़िर कहीं रह न पाए 
निर्मल यह मन हो दरिया के जैसा 
समन्दर सा खारा यह होने न पाए 
माँगूँ दुआएँ प्रभु से मैं हरदम 
कपट द्वेष मन में कहीं रह न जाए 
अपरिमित है साम्राज्य जिसका गगन में 
जलाता जो दीपक अनगिन आसमां में 
अद्भुत है सत्ता महा उस प्रभु की 
मन प्राण जीवन उसी में रमाएँ 
ये कोठी, ये बँगले बहुत हैं सजाए
ग़रीबों कि बस्ती उजड़ने न पाए 
तृप्ति से पूरित हों हर जन हमेशा  
शोषित धरा पर कोई रह न जाए 
दुखाओ कभी मत दिल तुम किसी का 
आह से उसकी कभी बच न पाए 
जलाओ ज़रा प्रेम कि अमर ज्योति 
अँधेरा किसी मन में रहने न पाए            कुसुम वीर 
 

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